Gadar Movie Director Anil Sharma Story; Marathi | Kashmiri Pandits | मां के गहने बेचकर बनाई पहली फिल्म: ‘गदर’ बनाने पर कहा गया ‘गटर’, 100 बार डिस्ट्रीब्यूटर्स के आगे हाथ-पैर जोड़े; फिर 800 करोड़ का रचा इतिहास

14 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी/भारती द्विवेदी

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60 के दशक में उत्तर प्रदेश के मथुरा में महज 6-7 साल का बच्चा घर आने वाले बॉलीवुड स्टार्स के स्टारडम से प्रभावित होता है। उम्र इतनी छोटी कि उसे ये नहीं पता था कि उसके घर आने वाले लोग कौन हैं, लेकिन उन्हें देखने के लिए उमड़ने वाली भीड़ उसे आकर्षित करती थी। उनकी सिक्योरिटी में लगे पुलिस के बड़े ओहदे वाले अफसरों को देख उसे ताकत का एहसास होता था। बस छोटी सी उम्र में सोच लिया कि उसे इसी लाइन में जाना है, बिना जाने कि बॉलीवुड होता क्या है।

उस बच्चे का गोल इतना क्लियर था कि 16-17 साल की उम्र में नामी डायरेक्टर, प्रोड्यूसर बलदेव राज चोपड़ा यानी कि बीआर चोपड़ा का असिस्टेंट बन गया। नॉन फिल्मी बैकग्राउंड से आने वाले इस बच्चे ने महज 21 साल की उम्र में उस समय की सुपरस्टार हीरोइन राखी को लेकर अपनी पहली सुपरहिट फिल्म बना दी। उसके बाद इंडस्ट्री को बैक टु बैक सात हिट फिल्में दीं और वो सिलसिला आज तक जारी है।

वो छोटा सा बच्चा आज बॉलीवुड का बड़ा और सक्सेसफुल नाम, डायरेक्टर अनिल शर्मा हैं। जिनकी एक्शन फिल्में देख दर्शकों में जोश आता है तो उनकी बनाई फैमिली ड्रामा देख ऑडियंस रोने पर मजबूर हो जाती है।

सक्सेस स्टोरी में डायरेक्टर अनिल शर्मा बता रहे हैं फिल्म ‘श्रद्धांजिल’ से ‘गदर-2’ बनाने का सफर…

बचपन में घर पर सेलिब्रेटी का जमावड़ा देखा

मेरा बचपन मथुरा की होली वाली गली में बीता। मेरे दादा जी पंडित डालचंद जोशी थे, जो एक प्रकांड पंडित थे। मेरे पिता कृष्णचंद शर्मा, जो एक कंपनी में काम करते थे, लेकिन बाद में फिल्म प्रोड्यूसर बने। मैं 6-7 साल का था, जब मेरे मन में सवाल आया कि रेडियो में गीत कैसे आते हैं?

गलियों में अगर कोई गाना गाते गुजरता तो मेरी दिलचस्पी उसमें भी होती थी। फिर एक दिन मेरे घर में बहुत सारे लोग जमा हुए थे। घर के बाहर पूरा मथुरा उमड़ पड़ा था। घर पर तरह-तरह की चीजें लाईं जा रही थीं। उसमें डाइनिंग टेबल भी था। जो उस वक्त मथुरा में किसी के घर में नहीं होता था। फिर मुझे पता चला कि ये सारी तैयारियां और भीड़ एक महिला सेलिब्रेटी के लिए आई थी। वो महिला सेलिब्रेटी गीता दत्त थीं।

अनिल के दादा जी नामी एस्ट्रोलॉजर थे। (फोटो में अनिल के पिता और दादा)

गीता दत्त मेरे दादा जी से मिलने आई थीं और लंबे समय तक मेरे घर पर रहीं। उनके साथ उनके तीन बच्चे भी थे। जो बिल्कुल फिल्मों जैसे कपड़े पहनते थे, अंग्रेजी में बात करते थे। उस वक्त मेरे दिमाग में था कि ये कौन लोग हैं। किस दुनिया से आए हैं।

फिर धीरे-धीरे मैंने देखा कि मुंबई से दादा जी के पास बहुत सारे लोग आते थे। हर बार भीड़ भी जमा होती थी। धीरे-धीरे मुझे पता चला कि ये फिल्मी दुनिया के लोग हैं। फिर मैं मथुरा में कृष्ण लीला में पार्ट लेने लगा। फिल्में देखना शुरू किया, तब प्ले का हिस्सा बनने लगा। मुझे एहसास हुआ कि मेरा मन इन्हीं चीजों में लग रहा है। फिल्म इंडस्ट्री क्या है बिना जाने, मैंने बचपन में तय किया कि मुझे फिल्मी दुनिया में जाना है।

17 साल की उम्र में तय किया कि डायरेक्टर बनूंगा

मैंने काफी कम उम्र में फिल्म लाइन को अपना करियर चुन लिया था। मेरी शक्ल-सूरत भी ठीक ठाक थी। लोग तारीफ करते थे। कृष्ण लीला और प्ले की वजह से मेरे अंदर थोड़ी बहुत एक्टिंग की समझ थी और कर भी लेता था। लोग मुझे सलाह देते थे कि एक्टिंग की तरफ जाओ, लेकिन मैंने अपना आकलन किया।

मुझे पता था कि अगर मैं एक्टिंग में आता तो बहुत बड़ा एक्टर नहीं बन सकता था। मुझे कहानी लिखना पसंद था और फिल्म बनाना चाहता था। मैं अपनी बात लोगों तक पहुंचाना चाहता था। मेरे मन में था कि अगर मैंने डायरेक्शन अच्छा किया तो बड़े 10-20 डायरेक्टर्स में मेरा नाम आ जाएगा इसलिए मैंने डायरेक्शन को चुना।

मैंने पूरे होशो-हवास में जो फैसला लिया था, उस एक फैसले ने मेरी तकदीर को मेरा साथ देने पर मजबूर कर दिया।

अनिल अपनी सफलता के पीछे अपने माता-पिता का बहुत बड़ा योगदान मानते हैं।

इंडस्ट्री में काम करने के लिए अंग्रेजी-मराठी सीखी

मेरे पापा मुंबई आ चुके थे। वो फिल्में बनाने का काम कर रहे थे। मैंने जब पापा से कहा कि मैं फिल्म लाइन में काम करना चाहता हूं तो इस बात पर कोई हल्ला नहीं मचा। मैं पहली बार जब मुंबई पहुंचा तो दादर स्टेशन उतरा था। मुझे लेने दो-तीन लोग आए थे। जब मैं स्टेशन से घर के लिए निकला तो हर जगह राजेश खन्ना का पोस्टर था।

मुझे ऐसा लगा कि मैं राजेश खन्ना की दुनिया में आ गया हूं। मुझे लगा ये तो मेरी दुनिया है। मैं मथुरा से बहुत सारी हिंदी की किताबें लेकर मुंबई पहुंचा था। पापा ने धीरे-धीरे मुझे अंग्रेजी और मराठी अखबार थमा दिया।

उन्होंने कहा कि यहां काम करना है तो अंग्रेजी और मराठी दोनों सीखनी पड़ेगी। मैं पापा के सामने हर दिन बोल-बोलकर दोनों अखबार पढ़ता था। पापा नहीं होते तो मां बैठ जाती और कहती कि बोलकर पढ़ो।

बीआर चोपड़ा को कहानी सुनाई तो हंसकर लोटपोट हुए

18 साल का था, जब मुंबई में सबसे पहले बीआर चोपड़ा के यहां काम मांगने पहुंचा। मेरा पापा चोपड़ा जी को जानते थे। उस वक्त एक बड़े जर्नलिस्ट थे, जिनसे भी मेरे पिता की अच्छी जान-पहचान थी। उन्होंने बीआर चोपड़ा से कहा कि एक यंग लड़का है, वो आपको कहानी सुनाना चाहता है।

चोपड़ा जी काफी दयालु थे और उन्होंने मुझे 10 मिनट के लिए मिलने बुलाया। 10 मिनट की मीटिंग साढ़े तीन घंटे चली। मैंने चोपड़ा साहब को एक कहानी सुनाई। उन्हें मेरी कहानी बहुत पसंद आई। वो कहानी को सुनकर हंसकर लोटपोट होते रहे। फिर मैंने उन्हें बताया कि मैं डायरेक्ट बनना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि मेरी फिल्म ‘पति पत्नी और वो’ शुरू होने वाली है। तुम आ जाओ काम करने।

पहले दिन सेट पर किसी ने सीधे मुंह बात नहीं की

जब मैं पहले दिन सेट पर काम करने पहुंचा तो खबर फैल गई कि बीआर चोपड़ा के जरिए बाहर से कोई लड़का आया है। उस समय एक डायरेक्टर के साथ 16-17 लोग असिस्टेंट के तौर पर काम करते थे। इनमें से महज 4-5 लोगों को सैलरी मिलती थी। बाकी के लोग फ्री में काम करते थे और वो सारे ही बड़े लोगों के बच्चे होते थे। वो फ्री में बस इसलिए काम करते थे ताकि उन्हें कहीं से शुरुआत करनी होती थी।

ऐसे में मेरे आने पर उन्हें लगा कि एक और लड़का आ गया। मैं पहले दिन जब सेट पर पहुंचा तो मुझसे किसी ने बात नहीं की। कुछ देर मैं चुपचाप बस देखता रहा, फिर मैंने एक रिपोर्ट बुक को हाथ लगाया। जैसे ही मैंने हाथ लगाया, एक लड़के ने मेरे हाथ पर मारा। उसने मुझसे कहा कि हमें इस रिपोर्ट बुक तक पहुंचने में ढाई साल लग गए। ऊपर से सोर्स लगाकर आ गए हो और आज ही इसे छूना चाहते हो।

फिर कैंटीन में गया तो वहां सब साथ खाना खा रहे थे और मैं अकेले बैठा था। ऐसे में एक असिस्टेंट कैमरामैन का बेटा मेरे सामने आकर बैठा और मुझसे नाम पूछा। मैंने जब अपना नाम बताया तो उसने कहा शर्मा जी के बेटे हो?

दरअसल, उन सबको लग रहा था कि एक प्रोड्यूसर थे शर्मा जी, जो बीआर चोपड़ा के साथ फिल्म कर रहे हैं, मैं उनका बेटा हूं। मैंने बताया कि नहीं मैं उनका बेटा नहीं हूं। मेरा इतना कहते ही उन्होंने राहत की सांस ली। वो सेट पर मेरी पहली दोस्ती हुई।

धीरे-धीरे सबने मुझसे बात करना शुरू किया। मैंने सेट पर सभी असिस्टेंट का असिस्टेंट बनकर काम किया। फिल्म के आखिरी दिन चीफ ने मुझे क्लैप देने को कहा। मैंने अब तक सेट पर क्लैप को हाथ भी नहीं लगाया था। एक गाने का शॉट था और साइलेंट शॉट था। ऐसे में क्लैप से आवाज नहीं आनी चाहिए थी। मैंने डरते-डरते वो क्लैप दिया। उस वक्त मन में एक बात आई कि चलो यहां तक तो पहुंचा।

हिंदी भाषा की वजह से मैं सेट पर जरूरी बन गया

उसके बाद ‘द बर्निंग ट्रेन’ की शूटिंग शुरू होने वाली थी। उस वक्त टाइपिंग की सुविधा नहीं थी। असिस्टेंट को सीन हाथ से लिखने पड़ते थे या कॉपी करना पड़ता था। ‘द बर्निंग ट्रेन’ में चालीस एक्टर थे तो चालीस कॉपी बनानी थी। मैंने इस काम का जिम्मा सेट पर ले लिया। मेरी हिंदी भी अच्छी थी, वहां सेट पर बाकी असिस्टेंट को हिंदी भी नहीं आती थी।

बड़े घर और मुंबई वाले बच्चे सिर्फ इंग्लिश में ही बात करते थे। देखा जाए तो वो लेबर का काम था। सेट पर सबको लगा चलो ये अच्छा लड़का मिल गया है। मैं सुबह 9 बजे से रात के 1 बजे तक सिर्फ सीन लिखता था। रवि चोपड़ा ने मेरी मेहनत को नोटिस किया। उन्होंने कहा कि ये लड़का तो बहुत मेहनत करता है। इस तरह उन्होंने मुझे ‘द बर्निंग ट्रेन’ में असिस्टेंट का काम दिलवाया। मैंने बीआर चोपड़ा को तीन फिल्मों में असिस्ट किया था।

अनिल ने अपने 45 साल के करियर में 19 फिल्में बनाई हैं। अपनी हर फिल्म उन्होंने बड़े स्टार के साथ बनाई है। (फिल्म तहलका के एक्टर्स के साथ अनिल…बाएं से दूसरे)

मां ने मेरी पहली फिल्म के लिए ज्वेलरी बेच दी

मैंने अपनी पहली फिल्म ‘श्रद्धांजलि’ महज 21 साल की उम्र में बनाई थी। मैं लीड रोल में उस वक्त की सुपरस्टार राखी को लेना चाहता था। मैंने राखी को कहानी सुनाई और उन्होंने फिल्म के लिए हामी भर दी। मैंने उन्हें टोकन अमाउंट दिया और घर आकर पेरेंट्स को बताया। वो भी काफी खुश हुए।

मैंने मां-पापा से कहा कि फिल्म खुद प्रोड्यूस करूंगा। हमारे पास पैसे नहीं थे, फिर भी पापा ने कहा कि हम कुछ ना कुछ करेंगे। डेढ़ महीने बाद फिल्म की शूटिंग थी। मैं तैयारियों में जुट गया, मुझे पता भी नहीं था कि पापा के पास कितने पैसे हैं। मुझे लगा पापा कुछ ना कुछ जुगाड़ कर ही लेंगे। मुझे मां-पापा पर इतना भरोसा था।

तीसरे दिन ही राखी का फोन आ गया कि 25 हजार रुपए चाहिए। वो कहीं बाहर जा रही थीं तो उन्हें कपड़े बनवाने थे। साल 1981 के हिसाब से 25 हजार रुपए बहुत ज्यादा होते थे। मेरी मां ने जब सुना तो वो अपनी शादी के गहने अलमारी से निकालकर लाईं। पापा को दिए और कहा कि इसमें 40-50 हजार हो जाएंगे।

पापा वो गहने लेना नहीं चाहते थे, लेकिन मां के कहने पर बड़ी मुश्किल से माने। पापा ने उन गहनों को बेचने के बजाय गिरवी रख दिया। उस पचास हजार में से मैंने 25 हजार राखी को दिए और बाकी के 25 से मैंने दूसरे एक्टर्स को साइन किया। गाने और बाकी तैयारियों में खर्च किया। मेरी पहली फिल्म तमाम चुनौतियों के बीच बनी और सुपरहिट रही।

‘गदर’ की कहानी पढ़कर आनंद बख्शी रो पड़े

‘गदर’ से पहले मैंने कश्मीर के बैकग्राउंड पर फिल्म बनाने की सोची। उन दिनों कश्मीर से पंडितों का पलायन हुआ था। मैंने फिल्म का नाम कश्मीर सोचा था। मैं इस कहानी में दिलीप साहब और धर्मेंद्र जी को लेने वाला था। दिलीप साहब के किरदार का नाम और काम दोनों तय कर लिया था।

जब मैंने दिलीप साहब को कहानी सुनाई तो उन्हें बहुत अच्छी लगी। उन्हें इतनी पसंद आई थी कि वो अपना किरदार एक्ट करके बताने लगे। हालांकि मेरी वो कहानी आधी ही थी, उसका सब प्लॉट अभी लिखा जाना था।

ऐसे में मैंने राइटर शक्तिमान तलवार से कहा कि सब प्लॉट में कश्मीर का लड़का और पाकिस्तान की लड़की चाहिए। वो कहानी लिखकर लेकर आए। मैं उनका सब प्लॉट देख हैरान रह गया। वो अपने आप में पूरी कहानी थी।

गदर का गाना उड़जा काले कावा अनिल को पहले पसंद नहीं था, लेकिन उनकी पत्नी ने उनसे कहा कि ये गाना लोगों को बहुत पसंद आएगा। इस गाने को ना सिर्फ लोगों ने पसंद किया बल्कि बेस्ट लिरिक्स के कई अवॉर्ड भी मिले।

मैं राजकपूर, यश चोपड़ा जी का बहुत बड़ा फैन रहा हूं। मैं लव स्टोरी भी बनाना चाहता था। मैंने सोचा कि अब दिलीप कुमार वाली फिल्म बाद में बनाऊंगा, पहले सब प्लॉट की कहानी को बनाऊंगा। मैं दिलीप साहब के पास गया और उन्हें अपनी मनोस्थिति बताई। उन्होंने भी बड़े प्यार से हामी भर दी।

इस तरह ‘गदर एक प्रेम कथा’ की शुरुआत हुई। फिर मैं गदर की कहानी लेकर गीतकार आनंद बख्शी के पास पहुंचा। कहानी पढ़ने के दौरान वो बार-बार वॉशरूम उठकर जा रहे थे। मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि आंसू पोंछने जा रहा हूं। तुम्हारे सामने रोते हुए अच्छा नहीं लगेगा। उन्होंने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा कि अनिल शर्मा तुमने ‘मुगल ए आजम’ बना दी है।

‘गदर’ को खराब बोल डिस्ट्रीब्यूटर ने पैसे वापस लिए

‘गदर’ जब बनकर तैयार हुई, तब फिल्म का 50 बार ट्रायल हुआ। मेरी फिल्म को डिस्ट्रीब्यूटर खरीद नहीं रहे थे। लोगों को लग रहा था कि कोई पंजाबी फिल्म होगी। मुझे कई लोगों ने ये तक कह दिया इसे हिंदी में डब करो। एक मेरा डिस्ट्रीब्यूटर दोस्त था, जिसने मेरे कहने पर पहले दिन इंदौर के लिए ‘गदर’ खरीद ली थी। उसने मुझे पांच लाख रुपए का टोकन भी दिया था।

फिल्म रिलीज से एक-डेढ़ महीने पहले उसने 100 लोगों के साथ फिल्म देखी। फिल्म देखने के अगले दिन वो मेरे पास आया और मुझसे पूछा कि तुमने ये फिल्म क्यों बनाई है? सनी देओल को तुमने सारंगी दे दी जबकि तुम्हें उसे बंदूक देनी चाहिए थी। मैंने 100 लोगों के साथ फिल्म देखी, किसी को अच्छी नहीं लगी। अगर तुम आधे दाम में फिल्म बेच रहे हो तो मैं खरीदूंगा, वरना मेरे पांच लाख रुपए वापस करवा दो।

आज की फिल्म विदेशों में शूट होती हैं, तुमने धूल-धक्कड़ में फिल्म बना दी है। आज के जमाने में कौन विभाजन की फिल्म देखेगा। तुमने पुराने जमाने की फिल्म बना दी है। मैंने अपने उस दोस्त को पांच लाख रुपए वापस कर दिए। फिल्म रिलीज हुई और पहले दिन ही ऑडियंस ने इसे हाथोंहाथ लिया। मुझे अलग-अलग शहरों से इसके क्रेज के बारे में पता चल रहा था।

वहीं, न्यूजपेपर में कुछ क्रिटिक्स ने मेरी फिल्म गटर एक प्रेमकथा करके हेडलाइन बनाई थी। मैं उस हेडलाइन को पढ़कर हंस पड़ा था। मैं अपनी फिल्म की सच्चाई और ताकत को जानता था। पहले दिन ही मेरी फिल्म ब्लॉकबस्टर हो गई थी। फिल्म का फुटफॉल 10 करोड़ था। लोग ट्रैक्टर में बैठकर फिल्म देखने पहुंच रहे थे। थिएटर में 24 घंटे शो चलाए जा रहे थे। ‘गदर’ का ऐसा क्रेज बना कि लोग थिएटर के बाहर तंबू डालकर बैठे रहते थे।

‘गदर-2’ बनाते समय इंडस्ट्री ने मुझ पर सवाल उठाए

जब मैं ‘गदर-2’ बनाना चाहता था, तब भी इंडस्ट्री में किसी को दिलचस्पी नहीं थी। फिल्म बनाने के लिए मुझे सिर्फ 60 करोड़ रुपए का बजट दिया गया था। पहले 40 करोड़ रुपए अप्रूव हुए थे, बाद में 15 करोड़ रुपए और मिले। मैंने कैसे भी हाथ-पैर जोड़कर जी स्टूडियो से बजट लिया।

उस वक्त जी में सारिक पटेल और पुनीत गोयल थे। इन दोनों ने मुझे सपोर्ट किया और बजट को बढ़ा दिया। हमने 60 करोड़ रुपए में फिल्म बनाई, जिसने 800 करोड़ रुपए का बिजनेस किया। वो भी 250 रुपए के टिकट प्राइस पर। हमने टिकटों के दाम 200-250 रुपए रखे थे। अगर हमने टिकट का प्राइस 400-500 रखा होता तो ‘गदर-2’ का बिजनेस 1500 करोड़ होता। फिल्म में 4-5 करोड़ का फुटफॉल था।

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दिल्ली का एक लड़का, जिसकी रगों में व्यापार और दिमाग में स्टार्टअप के आइडिया थे। लेकिन उसका खूबसूरत चेहरा और जबरदस्त डीलडौल उसके बिजनेस वाले टैलेंट पर भारी पड़े। कश्मीरी गेट की छोटी सी दुकान से निकलकर वो सीधे रैंप पर पहुंचा। वहां से मिस्टर इंडिया और मिस्टर इंटरनेशनल तक का सफर पूरा किया।​​​​​​ पूरी खबर पढ़ें…

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